क्यों और कैसे मनाई जाती है लोहड़ी?

By | January 11, 2017
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क्यों और कैसे मनाई जाती है लोहड़ी ?


क्यों और कैसे मनाई जाती है लोहड़ी?: लोहड़ी के पर्व का ध्यान आते ही या नाम सुनते ही मन में भांगड़ा, गिद्दा, मूंगफली और रेवड़ी की तस्वीर उभरने लगती है। ऐसा लगने लगता है अब सर्दी तो बस कुछ ही दिन की मेहमान है। लेकिन, कम ही लोग जानते हैं आखिर इस पर्व को मनाया क्यों जाता है? इस पर्व से जुड़ी क्या हैं लोककथाएं? आइए जानें…

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क्या है लोहड़ी? : मकर संक्रांति से पहले वाली रात को सूर्यास्त के बाद मनाया जाने वाला यह पर्व पंजाब प्रांत रा पर्व है। लोहड़ी का अर्थ हैः ल (लकड़ी)+ ओह(गोहा यानि सूखे उपले)+ ड़ी(रेवड़ी)। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही लोहड़ी की अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को मां के घर से ‘त्योहार’ (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि) भेजा जाता है। यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति का प्रायश्चित्त ही इसमें दिखाई पड़ता है।

लोहड़ी का प्रसाद: लोहड़ी से 20-25 दिन पहले ही बालक एवं बालिकाएं ‘लोहड़ी’ के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। संचित सामग्री से चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। मुहल्ले या गांव भर के लोग अग्नि के चारों ओर आसन जमा लेते हैं। परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है। रेवड़ी (और कहीं कहीं मक्की के भुने दाने) अग्नि की भेंट किए जाते हैं तथा ये ही चीजें प्रसाद के रूप में सभी उपस्थित लोगों को बांटी जाती हैं। घर लौटते समय ‘लोहड़ी’ में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में घर पर लाने की प्रथा भी है।



लोहड़ी के नाम पर पैसे मांगते हैं बच्चेः लोहड़ी के दिन या उससे दो चार दिन पूर्व बालक बालिकाएं बाजारों में दुकानदारों तथा पथिकों से ‘मोहमाया’ या महामाई (लोहड़ी का ही दूसरा नाम) के पैसे मांगते हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में प्रयुक्त करते हैं।

लोहड़ी व्याहनाः शहरों के शरारती लड़के दूसरे मुहल्लों में जाकर ‘लोहड़ी’ से जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने मुहल्ले की लोहड़ी में डाल देते हैं। यह ‘लोहड़ी व्याहना’ कहलाता है। कई बार छीना-झपटी में भी हो जाती है।

लोहड़ी का त्योहार और दुल्ला भट्टी की कहानीः लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। लोहड़ी के सभी गाने दुल्ला भट्टी से ही जुड़े हैं तथा यह भी कह सकते हैं कि लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता है। दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस समय संदल बार की जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बलपूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न ही मुक्त करवाया बल्कि उनकी शादी हिन्दू लडकों से करवाई और उनकी शादी की सभी व्यवस्थाएं भी करवाई।

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